Tuesday, 5 December 2017

Life After You Start Working

“Bhai, kal tu college ja raha he?”
“Nhi!”
“Chal me bhi nhi jayunga fir”

Felt nostalgic, a little? I sure did.



And this brings me to the first thing you cannot do when you start working, which are such implusive emotional decisions. If you disagree, then remember the number of times you have taken an unplanned leave on a Monday?!

Due to such and many more small yet significant things, I miss the college days and I am sure a lot of you feel the same. After all, those were the days when you could take emotional decisions freely, bunk the classes without hesitation and had a group of friends called your gang who always stuck around through all your highs and lows.

However, now, after you have started working in a company, the table has turned. Performance ratings and appraisals have wiped off emotions and caged in ‘aaj kuch tufaani karte hai’ moments which were in plenty during the college days.

Now, the most tufaani moment is to get that trouser fit in, after compressing that next-to-pregnant-belly, a little, and to leave the office at 6 pm on Friday.

Also, you spend every single day thinking about making more money and using the same to find happiness, which was free back in the college days.

A lot of other changes have come as well, like back then, when you couldn’t afford a McD meal on your own, sadly now, when you can, you don’t have friends to share it with!
Also, in college, when a cup of chai with friends was enough to make our day. Now, even a team party at a lavish 5-star hotel doesn’t give that sort of satisfaction.

Honestly, no matter how many friends you make in your professional life, the place in your heart that your college buddies have can never be replaced (unless one of them went on to be your gf and then ex-gf) because, ‘Aur bhosdike, kaisa he?!’ is more pleasant to the ears than ‘Hey, how are you?!’ (unless coming from a total stranger)

At the end, am pretty sure you too had one hell of a ride this year. A lot of changes would have come, new promises made, few broken, people were left behind, certain life changing decisions would have been taken. 

In fact, a couple of your friends would have even gotten married. But all this while, even if you were not the best version of yourself. Maybe, you couldn’t commit to what you promised at the start of this year. Or perhaps, your office life is totally a lost case, believe this and just remember your college day. Maybe, it won’t fix the current situation you are in, but it would definitely break the stress and lighten the tension, which in most cases is enough to get going.

P.S: Call your college friends more often. Those people are definitely a great stress reliever. Believe this. Ciao!

Thursday, 17 August 2017

Honest Indian Mindset Behind Sarahah

Thursday, August 17, 2017 By , , 12 comments


I had to write about it. The craving was so high that I could not procrastinate it. Sorry laziness, better luck next time!

Sarahah! The name needs no introduction because the chances are quite high that you have already downloaded the app and have waited patiently for those ‘genuine’ appreciations and criticism (milti sabko he, but batata koi nhi he). The picture below describes exactly what I feel about it. Sorry if that hurts your feelings! *Azaad desh ke azaad nagrik ki azaad sooch he*



Now, every time, every single time, I open Facebook, what do I see? People put up the screenshot about an anonymous person who has appreciated them and they ask to get in touch with them.

Bhaiya, banda/bandi isi ka to wait kar rahe the ki kab aap unhe bolenge to get in touch. Unke uparto shraap tha iske pehle contact na kar pane ka.

Isi screenshot ko dekh ke hi to Bruce Wayne ne bhi Gordon ko apni asliyat bata di. Aur Gangadharbhi Geeta Vishwas ka isi cheez ko leke wait kar raha tha! Samjhe!





Anyway, I pondered about the mindset that drags people to follow the bandwagon and download the app. I have jotted down the same thing below in an ‘honest’ manner. My interpretation might not be as apt, but certainly, it will tickle your funny bone:

*Random person, not aware about Sarahah, opening their Facebook account*

“Chull ho rahi he, Facebook kholta hun.”

“Ye kya screenshot laga rakha he aur isme appreciation likhi he. Is bande ke liye appreciation! Hehehe!”

*Scrolls down*

“Fir waisa hi screenshot! Isme bhi jhoot”

*Scrolls further down*

“Bawa re bawa, ye chal kya raha he. Har koi wahi cheez ka screenshot laga raha he”

“Man to kar raha he ki istmaal karu. But mere sane dost fir mera mazaak udayenge ki bheed me shareekh ho gaya. Kya karun?”

“Appreciation ki apne ko bohot laalach to he. But kisi ne gaali bhej di to? Post nhi karenge public me. Hehehe. BUT, agar kisi ne koi tareef nhi kari to? Locha ho jayega!”

“Kya karun?! Bandwagon me shamil hona pasand nhi he, but laalach to ho rahi he.”

“Par kya pata koi bethi ho mere is app ko join karne ke intzaar me, tabhi wo apna pyaar kaboolkaregi mere liye. Jo itne saalo me kabhi nhi huya, is app se ho jaye. Desperation to andar bhara he hi apne me!”

“Appreciation nhi aayi to khud se hi post kar denge. Spotlight to chahiye hi!”

“Bohot pressure he yaar. Aaj tak kabhi esa chutiyapa nhi kiya. Aaj apni izzat dao pe rakhu kin hi?!”

*After not so long time*

*Posts the Sarahah’s link to social media*

Aur isi tarah bik jate he log tareefo ke lalach me!

If you like this post, please do share it. And let me know your opinion about the same in the comment section below. Cheers!

Sunday, 13 August 2017

EK AAM KAHANI # 6

Sunday, August 13, 2017 By , , No comments

शाम का समय था। मुंशी जी के बेटे का रिजल्ट आने वाला था। उनके ऑफिस ख़त्म होने में कुछ आधा घंटा ही बचा था। चिंता सुबह से ही उनको खाये जा रही थी, की अगर उनका बेटा, गोपाल, फेल हो गया तो आगे क्या होगा। वजह वाजिब भी थी क्यूंकि उनकी आर्थिक स्तिथि कुछ सही नहीं थी। पत्नी की तबियत ख़राब चल रही थी, उसकी गोली दवाई में आधी तनख्वा चली जाती थी। बचे पैसो से जैसे तैसे घर का खर्च चला रहे थे तथा अपने बेटे की पढाई करवा रहे थे।


चिंता के बादल इतने में ही नहीं थमते थे। इससे बड़ी परेशानी ये थी की अगर उनका बेटे पास भी हो जाता हे और उसको स्कालरशिप नहीं मिलती तो प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाने के पैसे कैसे जमा हो पाएंगे। इन्ही सब चिंता में सारा दिन निकल गया था। सब्र का बाँध भी मानो टूटने की कगार में था।

ये सब के बीच में फैक्ट्री का साईरन बजता है। मुंशी जी अपनी व्यथा और चिंताओं के पिटारे को दिल में दबा के पैदल चल देते हे बस स्टॉप की तरफ। रिजल्ट की चिंता उनके चेहरे पे स्पष्ट नज़र आती है।

बस स्टॉप में बस को देखने के लिए मुंशी जी राइट साइड देखते है। एक बार तो ये भी सोचते हे की पैदल ही निकल चले, परन्तु घुटने के दर्द को याद करते हुए रुक से जाते है। तभी दूर से एक लाल डब्बा उनकी ओर आता नज़र आता है। 'चलो कुछ तो अच्छा हुआ ', ये बोलते हुए लम्बी सास छोड़ते है। उसी वक़्त उनके फ़ोन में घंटी बजती है। फ़ोन पुराना हे और स्क्रीन ने साथ काफी हद्द तक छोड़ चूका हे। हाथ से स्क्रीन पूछते हुए वो उसको उठाते है।

"पापा, में अव्वल नंबर से पास हो गया", दूसरे तरफ से आवाज़ आती है।

वो उस आवाज़ को पहचान जाते है। उनके चेहरे के सारे रंग मानो लौट आये हो। वो ख़ुशी से कूदना चाहते है। अपने बच्चे को दुनिया की सारी ख़ुशी देना चाहते है और इसी उत्साह में वो उससे पूछते हे, "आज क्या खाओगे बेटे?"

घर की परिषतिथि जानते हुए उनका बेटा चुप कर जाता है। "बस आप घर आ जाइए,मुझे और कुछ नहीं चाहिए"

पर मुंशी जी भी बाप है। उनको पता हे की बेटे को जलेबी पसंद है। इसे याद रखते हुए, होठो में हलकी सी मुस्कान लिए कहते है, "ठीक हे, कुछ नहीं लाता"

कॉल कट्टा है और इतने में बस उनके सामने आके खड़ी हो जाती है। महीने का आखरी हफ्ता है और जलेबी लेते हुए जाना है। ये सोचते हुए वो अपनी जेब में हाथ डालके पैसे गिनते है। मात्र १० रूपए मिलते है।

मुंशी जी असमंजस में पद जाते है की बस से ५ km का सफर करे उन पैसो से, या फिर जलेबी अपने बच्चे के लिए लेके जाएँ। एक तरफ उनके घुटने का दर्द भी उनको याद हे परन्तु अपने बच्चे के चेहरे में जलेबी को देख के आने वाली ख़ुशी को वो मिस नहीं करना चाहते।

धीरे धीरे यात्री भी बस में चढ़ने को आ गए है। आखरी बंदा चढ़ता है, वो पीछे मुद के मुंशी जी को देखता हे की वो चढ़ जाएँ।

तभी, तभी मुंशी जी कुछ ऐसा कर जाते हे जिससे देखने वाले हैरान रह जाते है। वो सड़क उतर कर पैदल ही घर की और चल देते है।

और भला चले भी क्यों न ? बच्चे की मुस्कान कभी घुटनो के दर्द से छोटी हुई है ?!

Wednesday, 2 November 2016

EK AAM KAHANI #5

Wednesday, November 02, 2016 By , , 14 comments


ट्रैन के उस डब्बे में दूर से एक धीमे आवाज़ कपूर साहब के कानों में पद रही थी। समय के साथ वो आवाज़ पास आती जा रही थी। कुछ समय बाद जब एक बड़ी ही कर्कश आवाज़ कपूर साहब की कानो में पड़ी तो वो मुह बनाते हुए पीछे की तरफ मुड़े। देखने पे पाया की दो लड़के कोई सा लोक संगीत गा रहे थे और उनमे से एक छोटा सा सितार जैसा यन्त्र बजा रहा था।




धीरे-धीरे वो कपूर साहब के कम्पार्टमेंट में भी गए। पता चला की उनमे से एक अंधा था। वो दोनों ने वहां कुछ पलो के लिए गाना सुनाया। फिर गाना रुका तो दोनों हाथ फैलाये एक लड़का पैसे मांगने  लगा। मांगता भी क्यों नही, गाना जो गया था उन्होंने।

दो तीन दफा बोलने पे, चार पाँच लोगो ने लड़के के हाथ में एक दो रूपए के सिक्के रख दिए। यह देखते हुए कपूर साहब का जैसे सब्र का बांद ही टूट पड़ा।  

"आप लोगो ने फ़िज़ूल में ही इन्हें पैसा दिया है। देखिएगा, ये इसका उपयोग नशा करने के लिए करेंगे। मैने हमेशा यही देखा है। ऐसे बच्चो को भीख़ देनी ही नही चाहिए। "

इस बात पर कई लोगो ने मुंडी हिलाई। हालांकि, कुछ लोगो का दृष्टिकूण्ड कुछ अलग था, पर वो शांत रहे। भला कौन मु जोरि करे सोच के शांत रह लिए। पर ये बात उन बच्चो को कुछ जमी नही। उन्होंने तुरंत जवाब दिया।

"साब हम ये पैसा अपनी पढाई की शुरुआत करने के लिए कमाते है। गाना गाना और बजाना थोड़ा बहुत आता है, इसलिए वही करते है। पर बिना किसी बात की भीख नही मांगते।"

ये सुनते ही कपूर साहब को गुस्सा गया। भला आता कैसे नही, एक छोटे से बच्चे ने भरी ट्रैन में सेकड़ो मुसाफिरों के सामने एक वाज़िब बात जो कर दी थी। गुस्सा आना तो बनता था।

"बेटा हमें मत बताओ ये सब। सब जानते है तुम लोगो की करतुते। तुम जैसे बच्चो का कुछ नही हो सकता। "

ये सुनने पर उस लड़के ने कुछ नही कहा। एक शब्द भी निकले उसके मुँह से। पर जाते जाते उसकी आँखें सब बयां कर गयी। ऐसा  लगा मानो कह रही हो...

'साब, हो सकता है की कुछ भी हो। हम ऐसे ही गाना गाके पैसे जुटाते रहे। हो सकता है। पर ये भी हो सकता है की हमारा समय बदले। हम अच्छे से पढ़ लिखकर कुछ बड़ा कर जाएँ। मेरा दोस्त देखने लग जाये। परंतु, एक चीज़, जो कभी नहीँ बदलेगी चाहे लाख चीज़े कह लो, वो है आपकी राय। इसको बदलपाना असंभव है।'

और वाकई, किसी की राय बदलना आसान काम नही है।